मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।
राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।
धर्मग्रंथ सब एक सिखाते, क्या मस्जिद क्या शिवाला,
एक तरह से सब पहुँचाते, सबमें एक ही हाला,
भेदभाव को दूर भगाकर मेल कराती मधुशाला।
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